कम में संतुष्ट रहने और जीवन में सच्ची खुशी पाने का प्रेरणादायक दृश्य

वो सबसे बड़ा धनवान है, जो कम-से-कम में संतुष्ट है, क्योंकि संतुष्टि प्रकृति की सबसे बड़ी दौलत है

पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।
दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम॥

यदि नाव में पानी भर जाए तो नाव डूब जाती है, और यदि आवश्यकता से अधिक धन आ जाए तो मन में लालच और अहंकार भर जाता है। समझदारी इसी में है कि उस अतिरिक्त धन को समाज की भलाई में लगा दिया जाए, न कि उसका अंधाधुंध संचय किया जाए संतुष्टि ही सबसे बड़ी दौलत है।

सन्तोष वह धन है जो व्यक्ति को प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर उसका त्यागपूर्ण उपभोग की प्रेरणा देता है। इस प्रकार का उपभोग आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक स्वच्छ, सुन्दर एवं समृद्ध धरा को सँजोता है।

1. देश के सतत विकास की आधारशिला का निर्माण

सन्तुष्टि का यह भाव किसी व्यक्ति, समाज एवं देश के सतत विकास की आधारशिला का निर्माण करता है। यह स्वहित के साथ ही ‘परहित सरिस धर्म नहीं भाई’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए विश्व बन्धुत्व की भावना को सुदृढ़ करता है।

यद्यपि वर्तमान में संतुष्टि रूपी यह धन कहीं खोता जा रहा है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्रों पर इसके दुष्प्रभावों को देखा जा रहा है। आज का व्यक्ति कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक भौतिक संसाधनों को इकट्ठा करने की होड़ में लगा हुआ है। उसकी समस्त ऊर्जा आर्थिक संसाधनों को एकत्रित करने की ‘चूहा दौड़’ में ही खप जा रही है।

परिणामतः एक ओर वह कम उम्र में ही विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से घिर रहा है। जैसा कि डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट से भी स्पष्ट है कि भारत में 30 वर्ष की उम्र तक के व्यक्तियों में डायबिटीज एवं हृदय रोग सम्बन्धी विकारों में पिछले एक दशक में दोगुनी वृद्धि हो गई है तो दूसरी ओर वह अपने पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का भी समुचित निर्वहन नहीं कर पा रहा है।

2. युवाओं में बढ़ता तनाव

युवाओं में बढ़ता तनाव, नशाखोरी की प्रवृत्ति, तलाक के बढ़ते मामले, वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा की बढ़ती समस्याएँ इसी असन्तुष्टि से उत्पन्न कारकों के ही परिणाम हैं।

समाज चूँकि व्यक्तियों का ही समुच्चय होता है। अतः यह भी इसी असन्तोष से पीड़ित है। आश्चर्य नहीं कि देश में प्रत्येक 4 मिनट में एक विवाहिता दहेज की बलि वेदी पर चढ़ा दी जाती है। समाज में आर्थिक संसाधनों की उपलब्धि को ही सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि माना जाता है। फलस्वरूप माता-पिता द्वारा बच्चों पर अत्यधिक दबाव डालकर बच्चों की रुचि के विपरीत पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने का दबाव बनाया जाता है।

इसी प्रकार आवश्यक वस्तुओं की कमी होने पर कालाबाजारी शुरू हो जाती है। लोग अपनी वास्तविक आय छिपाकर आयकर की चोरी करते हैं।

3. असन्तुष्टि, देश मे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है।

असन्तुष्टि का यह भाव विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देता है। आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए नकल का सहारा लेना, विभिन्न गिरोहों द्वारा नकल का सामूहिक व्यापार करना, विभिन्न अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अति उच्च कीमतें वसूल करना, चिकित्सकों द्वारा फिजूल के स्वास्थ्य परीक्षणों एवं औषधियों का परामर्श देना इस बढ़ती भौतिकता एवं गिरते नैतिकता तथा संतुष्टि के पैमानों के कुछ उदाहरण हैं।

इसी क्रम में तकनीकी उन्नति को भी देखा जा सकता है। तकनीक के उपयोग ने जहाँ एक ओर मानव जीवन को सुगम बनाया है तो वहीं मानव की सर्वशक्तिशाली बनने की आकांक्षा ने ‘परमाणु बम’ जैसे सर्वनाशक अस्त्रों का भी निर्माण कराया है।

4. साइबर हमले से किसी राष्ट्र को पंगु बनाना

आज बिट क्वाइन के माध्यम से फिरौती माँगने, साइबर हमले से किसी राष्ट्र को पंगु बनाने से लेकर ‘डिजाइनर बेबी’ जैसे तकनीकी आयाम इसी मानवी असन्तोष की उपज है। आज राष्ट्र अपने मानव विकास की अपेक्षा अपने जीडीपी के आँकड़ों पर अधिक ध्यान देते दिखते हैं। पर्यावरणीय सरोकारों पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। आज के दौर मे सभी डिजिटल तकनीक पर निर्भर होते जा रहे है किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, बैंकिंग व्यवस्था, रक्षा प्रणाली, अस्पताल, सरकारी विभाग सभी इंटरनेट पर निर्भर है एसे मे साइबर हमला किसी भी देश की डिजिटल तकनीक को नुकसान पहुँचा कर देश को संकट मे डाल सकता है

5. प्रदूषण की बढ़ती समस्या

बढ़ता प्रदूषण लाखों लोगों की मृत्यु का कारण बन रहा है तो ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हैं। हमारा जल, जंगल, जमीन सभी प्रदूषित हो रहे हैं, जैव-विविधता खतरे में है परन्तु मनुष्य की आकांक्षाएँ कुलाँचे मार रही हैं।

सत्ता की भूख ने निरंकुश तानाशाहियों को जन्म दिया है, लोकतंत्र को दबाया जा रहा है। फिर चाहे वह म्यांमार हो या पाकिस्तान—अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जा रहा है। विश्व में सभ्यताओं के मल्टिंग पॉट कहे जाने वाले देश अमेरिका में भी गोरे-काले का भेद उभर आया है, आखिर यह सब मानव का असन्तोष एवं अधिक-से-अधिक शक्ति एवं संसाधनों को एकत्रित करने की लालसा नहीं तो और क्या है।

6. निष्काम कर्म योग की प्रेरणा

यदि मनुष्य संतुष्ट है तो इसका सीधा प्रभाव समाज एवं राष्ट्र पर पड़ता है। व्यक्ति की संतुष्टि का भाव उसे गीता में वर्णित निष्काम कर्म योग की प्रेरणा देता है। इसके माध्यम से एक ओर वह अपनी प्रगति के प्रयास करता है तो वहीं दूसरी ओर ‘किसी भी कीमत पर सफलता’ का मार्ग नहीं अपनाता है।

इसका सामाजिक प्रभाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। व्यक्ति की समरसता अन्ततः परिवार एवं समाज के माध्यम से देश के चरित्र में प्रकट होती है। सम्भवतः यही कारण है कि भूटान जैसे देश ग्रॉस हैप्पीनेस इंडेक्स को अपनी जीडीपी के ऊपर तरजीह देते हैं। आज यह आवश्यक भी है कि राष्ट्र अपने आर्थिक विकास के साथ ही मानव विकास सूचकांक को सुधारने का प्रयास करें।

सन्तोष के साथ किया गया आर्थिक विकास ही वस्तुतः सतत आर्थिक विकास को जन्म देता है जो कि भावी पीढ़ियों को भूख, कुपोषण, गरीबी से बचाकर ‘तेन त्यक्तेन भुंजीता’ का मार्ग प्रशस्त करता है।

7. व्यक्ति एवं समाज की संतुष्टि

व्यक्ति एवं समाज की संतुष्टि का यही भाव एक परिपक्व लोकतंत्र की पूर्वपीठिका का निर्माण करता है। यह राष्ट्र की उन्नति को लोकतंत्र का मूल आधार बनाता है। सत्ता की भूख नहीं, आमजन की सहभागिता इसी संतुष्टि का परिणाम होती है।

आज वैश्विक चुनौतियों यथा आतंकवाद से निपटना, शरणार्थियों की समस्या का समाधान, जलवायु परिवर्तन पर अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों का क्रियान्वयन, गरीबी, कुपोषण जैसी समस्याएँ इत्यादि के समाधान के मूल में यदि कुछ है तो वह है वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः’ की उक्ति को चरितार्थ करके ही इस विश्व को अधिक सुखद, शान्तिपूर्ण, समतापूर्ण, समावेशी एवं समृद्धशाली बनाया जा सकता है और इसके लिए जो सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य है, वह है आत्म की संतुष्टि की भावना। अगर आत्मा संतुष्ट हो गयी तो सब संतुष्ट हो गए

यह भावना ही वह शक्ति है जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती है, उसे जियो और जीने दो का नैसर्गिक सन्देश देती है। जीवन के झंझावातों में भी प्रेरणायुक्त एवं आशावान बनाए रखती है। उसे प्रेम, करुणा, तदानुभूति जैसे गुणों से युक्त करती है, सार्वभौमिक, भाईचारे के लिए प्रेरित करती है और महात्मा गांधी के शब्दों में उसे यह सन्देश देती है कि—

“जिस दिन प्रेम की शक्ति, शक्ति के प्रेम पर हावी हो जाएगी, उस दिन संसार की समस्त समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी।”

ज्यों-ज्यों सुरसा मुख करे, त्यों-त्यों रूप बढ़ाय।
लोभ तृष्णा बढ़त ही, कबहूँ न तृप्ति पाय॥

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