ज़िन्दगी को नाटक की तरह जीना चाहिए

ज़िन्दगी को नाटक की तरह जीना चाहिए

किसी भी व्यक्ति के ज़िन्दगी जीने के अनेक दृष्टिकोण हो सकते हैं ज़िन्दगी को नाटक की तरह जीना चाहिए

ज़िन्दगी जीने का तरीका क्या होना चाहिए? यह एक विषयनिष्ठ मामला है, लेकिन फिर भी इस विषयनिष्ठता के बावजूद ज़िन्दगी जीने के तरीको और उसके अनेक आयामों पर विचार किया जा सकता है। किसी भी व्यक्ति के ज़िन्दगी जीने के अनेक दृष्टिकोण हो सकते हैं। जैसे कोई आर्थिक सफलता को जीवन में सर्वोच्च वरीयता दे सकता है तो कोई समाजसेवा को, कोई सामाजिक सम्मान का अति आकांक्षी हो सकता है तो कोई राजनीति के उच्चतम शिखर पर पहुँचने की लालसा में प्रयासरत हो सकता है। कोई व्यवसाय की दुनिया में तो कोई वैज्ञानिक खोजों या खेल में सबसे आगे निकल जाना चाहता है, ये सभी अलग-अलग व्यक्तियों के जीवन के लक्ष्य हो सकते हैं, परन्तु प्रश्न यथावत् है कि इनको हासिल करने का तरीका क्या हो? क्या सुनिश्चित प्लानिंग व सटीक भविष्य-योजना के साथ कदम आगे बढ़ाए जाएँ या यूँ ही नाटकीय तरीके से परिस्थितियों पर अपने आपको छोड़कर आगे बढ़ा जाए अपने कर्मफल पर दृढ़ विश्वास रखते हुए।यह भी महत्त्वपूर्ण है कि ज़िन्दगी को नाटक की तरह जीने का आशय क्या है? क्या यह ‘नाटक’ सामान्य साहित्यिक नाटकों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है? या यहाँ पर इसका आशय कुछ और है, यहाँ ज़िन्दगी में नाटकीयता से आशय ज़िन्दगी के प्रति बेफ़िक्र नज़रिये से समझा जा सकता है, जहाँ ज़िन्दगी के प्रति ज़िन्दगी तथा परिस्थितियों के दबाव में जीने के प्रति आग्रह का भाव कमज़ोर पड़ता जाता है। ज़िन्दगी में बची रह जाती है सिर्फ काम करने की प्रेरणा, परिस्थितियों से टकराने का साहस और इस प्रयास में मिली असफलता को भी सहर्ष स्वीकार करने का साहस।

ज़िन्दगी को जीने के प्रति प्यास बनाए रखने पर ज़ोर

यहाँ ज़िन्दगी में सफलता से अधिक हमेशा ज़िन्दगी को जीने के प्रति प्यास बनाए रखने पर ज़ोर है। ज़िन्दगी को नाटक की तरह जीने का दूसरा आशय यह हो सकता है कि जीवन में आकस्मिकता, परिवर्तनशीलता तथा उत्तरोत्तर गुणात्मक सुधार का प्रयास लगातार होते रहना चाहिए।

ऐसा सिद्ध नहीं हो पाया है कि व्यक्ति मरने के बाद अगला जन्म पाता है या नहीं, अतः माना जा सकता है कि वर्तमान जीवन ही पहला और अन्तिम जीवन है। अतः वर्तमान जीवन को किसी निश्चित ढर्रे में बाँधकर जीने के बजाय प्रयोगशीलता तथा नवीनता और सतत परिवर्तनशीलता के साथ जीना चाहिए, बशर्ते कि यह तरीका समाज के नियमों और संस्कृतियों का व्यापक उल्लंघन न करता हो। क्या पता नए प्रयोगों के लिए अगली ज़िन्दगी मिले या नहीं। इस दृष्टिकोण से जीने से हो सकता है आज के भौतिकतावादी युग के मानकों के अनुरूप आपकी सफलता सीमित हो परन्तु—यह ‘गहन किंचित् सफलता, अतिभव्य असफलता’ हो सकती है, जो स्वच्छन्द प्रवृत्ति से जीने वालों को सन्तोष ही प्रदान करेगी।

ज़िन्दगी में नाटकीय का दूसरा अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि विपरीत या अनुकूल जैसी भी जीवनगत परिस्थितियाँ मेरे सामने हैं, मैं उनको सहर्ष स्वीकार कर उनमें गुणात्मक सुधार का प्रयास करूँगा। इस प्रयास में मैं हर परिस्थिति से टकराने को तैयार रहूँगा। इसी सन्दर्भ में जीवनगत परिस्थितियों को रंगमंच के रूप में स्वीकार करूँगा।

ज़िन्दगी को जीने का प्रयास करने में नाटक जैसी नाटकीयता स्वतः उत्पन्न हो जाती है

वैश्विक परिदृश्य में जहाँ सम्पूर्ण दुनिया एक विश्वगाँव बन चुकी है वहाँ जीवन के प्रति नाटकीयता वाला दृष्टिकोण अधिक सार्थक सिद्ध होगा क्योंकि आधुनिक मनुष्य का जीवन विश्व की तमाम घटनाओं से प्रभावित होता है, भले ही वह उनसे प्रत्यक्ष रूप से न जुड़ा हो। जैसे ईरान पर अमेरिका द्वारा प्रतिबन्ध लगाने

से पूरे विश्व के तेल आयातक देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं। इस सन्दर्भ में जीवन के प्रति नाटकीय वाला दृष्टिकोण और सहज लगने लगता है। इस दृष्टिकोण से जीने पर ज़िन्दगी में बाह्य दबावों का प्रभाव कम हो जाता है, या यूँ कहें उस प्रभाव से प्रभावित न होने की शक्ति बढ़ जाती है।

जीवन के प्रत्येक क्षण को पूर्णतावादी नजरिये से देखने वाले ‘क्षणवादी’ मान सकते हैं जो जीवन के प्रत्येक क्षण को पूर्णतावादी नजरिये से देखते हैं। ये लोग परिवर्तन को सबसे बड़ा सत्य मानते हैं अर्थात् इनके यहाँ ‘परिवर्तन ही सबसे अपरिवर्तनशील है’।

इस दृष्टिकोण से ज़िन्दगी को जीने का प्रयास करने में नाटक जैसी नाटकीयता स्वतः उत्पन्न हो जाती है तथा कुछ भी पूर्व नियोजित नहीं जान पड़ता है और इस क्रम में सफलता और असफलता दोनों को स्वीकार करते हुए निरन्तर ज़िन्दगी के अगले पड़ाव पर कदम बढ़ते चले जाते हैं।

निष्कर्ष

इसलिए कह सकते हैं कि ज़िन्दगी को नाटक की तरह जीना चाहिए। हाँ, इस तरह के दृष्टिकोण से अनिश्चितता के खतरे अवश्य बढ़ सकते हैं परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि जीवन को किस्मत के सहारे छोड़ दिया जाए, बल्कि नाटक की तरह जीने में यह भी सार छुपा है कि कर्म के प्रति आपकी गहरी आस्था होनी चाहिए। कर्म की इस प्रक्रिया में परिणामों से बहुत प्रभावित होने से बचना चाहिए। सकारात्मक सोच के साथ जीवन को निरन्तर अग्रसर करने का प्रयास करना चाहिए।

2 thoughts on “ज़िन्दगी को नाटक की तरह जीना चाहिए”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *