मैंने सुना है की वह गाँव से शहर मे रहने लगा और उसने करोड़ो का घर खरीदा है,
लेकिन बच्चों को आँगन दिखाने के लिए गाँव लाता है।
गाँव से शहर तक बदलते भारत की कहानी उपरोक्त दो पंक्तियों में विकसित शहर और समृद्ध गाँव की परिकल्पना को देखा जा सकता है। जब किसी व्यक्ति के सामने ‘शहर’ की बात की जाती है, तो खुद उसके दिमाग में ऊँची-ऊँची मंज़िले, लम्बी-चौड़ी सड़कें और उन पर तेज गति से दौड़ते वाहन सहज ही एक अनोखा रूप ले लेते हैं। वहीं, जब ‘गाँव’ की बात की जाती है, तो सबसे पहले कच्ची सड़के, किसान, पशु-पक्षी, प्राकृतिक वातावरण, खेत-खलिहान आदि का दृश्य सामने आता है। शहर एवं गाँव, इन दोनों को समझने के दो अलग अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। यदि प्रथम दृष्टिकोण से देखें, तो ये एक सिक्के के दो पहलू जैसे दिखाई देते है, लेकिन दूसरे दृष्टिकोण में परस्पर विरोधाभास दिखाई देता है।
भोजन करते समय यदि पहला निवाला स्वादिष्ट होता है, तभी भोजन करने मे और भी आनन्द आता है। प्राचीन भारत में वाराणसी, अयोध्या, मथुरा, कुरुक्षेत्र, पाटलिपुत्र, माहिष्मती सदृश विशाल नगर विद्यमान थे। वे आवास, रोजगार, अन्न-वस्त्रादि के सम्बन्ध में भी समृद्ध थे और सतत विकास के नजरिए से विकसित भी थे। इस सन्दर्भ में मगध साम्राज्य को भला कौन भूल सकता है। उस समय गाँव भी समृद्ध था, जिसको एक लोकोक्ति के रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है। (गाँव से शहर तक बदलते भारत की कहानी) एक व्यक्ति जब शहर में रोजगार हेतु प्रवास करता है, तो (जीविकोपार्जन की सफलता के सम्बन्ध में) किसी अन्य के पूछने पर वह उत्तर देता है— “अगर शहर में कुछ नहीं हो सका, तो अपने गाँव लौट आएँगे। यहाँ तो जीवन चल ही जाएगा।” क्योकि उसको पता है की गाँव मे वह अपने खेतो मे काम करके अपना और अपने परिवार का पेट भर सकता है।
गाँव से शहर की और पलायन
उपरोक्त पंक्ति से गाँव की मजबूती तो स्पष्ट नजर आती ही है। साथ ही, यह भी दिखता है कि गाँव से शहर में जाने वाला व्यक्ति की अपनी रुचि है अपनी ही रुचि के कारण वह गाँव से शहर की और पलायन हो रहा है, न कि मजबूरी के कारण। इस प्रकार यदि देखा जाये, तो व्यक्ति परस्पर सहयोग व समन्वय के भाव से ओत-प्रोत था और गाँव में ही व्यक्ति को आजीविका प्राप्त होती थी। जिससे शहरी पलायन की समस्या दिखाई नहीं देती थी। इस प्रकार व्यक्ति-विकास के सन्दर्भ में शहर तथा गाँव एक सिक्के के दो पहलू के रूप में नजर आते हैं। अगर भारत की बात की जाए तो भारत की आत्मा गाँव मे दिखाई देती है न की शहर मे।
अब दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाये, तो सर्वप्रथम आधुनिकता की अवधारणा दिखाई देती है। इस वैश्विक आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में प्रौद्योगिकी एक नूतन विचार के रूप में सामने आयी और शहर-गाँव के मध्य सभ्य-असभ्य के लक्षण का समावेश हुआ। शहरी क्षेत्रों में आधुनिकता का समावेश हुआ और औद्योगिकीकरण से नए नए आविष्कार दिखाई दिये। और अनेक प्रकार की सुविधाओं का विकास हुआ और सबसे पहले इन सुविधाओं का उपयोग शहरी क्षेत्रों के निवासियों ने किया। चूँकि, ग्रामीण इन आविष्कारों के अधिक महंगे होने अथवा अनुपलब्धता के कारण दूर रहे, इसीलिए शहर और गाँव के मध्य एक सूक्ष्म लकीर गहरी होती चली गयी।
इंटरनेट के उपयोग
गाँव से शहर तक बदलते भारत की कहानी लेकिन विकास की प्रकृति सतत गतिशील होती है, इसलिए देर-सवेर यह विकास गाँव तक भी पहुँचा। उदाहरणस्वरूप ‘इंटरनेट के उपयोग’ को लिया जा सकता है। आज गाव का हर एक व्यक्ति छोटा हो या बड़ा सभी इंटरनेट का उपयोग कर रहे है अगर यह देखा जाए की भारत पहले मुगलों के अधीन रहा और उसके बाद अंग्रेजों द्वारा शोषित हुआ। इन दोनों कालों में आधुनिक भारत के शहरों का विकास तो हुआ, किन्तु गाँवों का पतन भी हुआ। विशेष रूप से अंग्रेजी शासनकाल में ‘एकपक्षीय-व्यापारनीति’ तथा ‘औद्योगिकीकरण’ से कुटीर एवं छोटे-मझोले उद्योग क्षीण हो गए। परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्र के निवासी शहर की और पलायन हेतु विवश हुए।
आज अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि ‘गाँव से शहर की और लोगो का पलायन क्यो है‘? और आखिरकार इस का निवारण कैसे किया जा सकता है? क्योंकि समस्याएँ तो दोनों ही परिवेशों में विद्यमान हैं।
वैश्विक औद्योगिकीकरण
वस्तुतः वैश्विक औद्योगिकीकरण के अत्यन्त मनोहर परिणाम सामने आये हैं, जिसने मानव जीवन को अत्यन्त सुकर बना दिया है। यदि हम जनसंख्या के आँकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 68.84 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण (1951 में 82.70 प्रतिशत) तथा 31.16 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्र (1951 में 17.30 प्रतिशत) में निवास करती है। इसलिए यह भी स्पष्ट है कि गाँव से शहर की ओर निरन्तर पलायन हुआ है। लेकिन, इस वैश्विक औद्योगिकीकरण के विभिन्न दुष्परिणाम भी वर्तमान में स्पष्ट हैं।

वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में एयरकंडीशनर (AC), वाहन-उपयोग, तीव्र औद्योगिकीकरण आदि के कारण विश्व के प्रमुख शहर एक उष्मरूपी शहर ’ के रूप में बन गए हैं। पर्यावरण प्रदूषण अब शहरी जीवन का एक अंग-सा बन चुका है। चूँकि, शहर में गाँव से रोजगार से सम्बन्धित सर्वाधिक पलायन होता है, इसलिए ग्रामीण क्षेत्रो के समक्ष एक दुविधा यह भी है कि वे गाँव का चयन करें अथवा शहर का। यदि शहर का चयन करते हैं, तो निस्सन्देह जीविकोपार्जन का जरिया तो प्राप्त हो सकता है, किन्तु उसके बदले स्वास्थ्य का मूल्य चुकाना पड़ता है।
अच्छी शिक्षा की उपलब्धता
ग्रामीण लोगो के शहरों की ओर पलायन के भी कई कारक हो सकते हैं, जैसे—अच्छी शिक्षा की उपलब्धता, आमदनी का अधिक होना, शहरी जीवन की ओर आकर्षण, स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतर उपलब्धता आदि। उदाहरणतः, स्वतंत्र भारत की प्रथम जनगणना (1951) के अनुसार भारत में 18% साक्षरता विद्यमान थी, जबकि औसत जीवन-प्रत्याशा मात्र 32 वर्ष थी। वहीं 2017 की 15वीं जनगणना के अनुसार भारत की साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत और औसत जीवन-प्रत्याशा 68.56 वर्ष रही है। स्वतंत्र भारत (1951) में शिशु मृत्युदर 190.0 (प्रति हजार पर) थी, जो वर्ष 2017 में मात्र 39/1000 के स्तर पर जा चुकी है। इस प्रकार यह भी एक प्रमुख पहलू है कि गाँव से लोग शहर की ओर कर रहे हैं। लेकिन शहर में व्याप्त अधिक जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, अपराध आदि के कारण वे दोनों के मध्य चयननात्मक द्वंद्व में फँस जाते हैं।
शहरी स्तरों पर बढ़ती जनसांख्यिकीय असंतुलन
यहाँ एक महत्वपूर्ण विचार यह भी हो सकता है कि यदि शहर में इतनी समस्या हैं, तो क्यों ना गाँव में भी ऐसी व्यवस्था का समावेश किया जाये, जिससे शहरी पलायन भी रुक सके और कृषि-क्षेत्र को भी गतिशीलता प्राप्त हो जाये। जब गाँव से शहर की ओर पलायन किया जाता है, तो शहर और गाँव–दोनों स्तरों पर दोहरी समस्या उत्पन्न होने की पूर्ण सम्भावना बनती है। प्रथम, शहरी स्तरों पर बढ़ती जनसांख्यिकीय असंतुलन देखने को मिलता है। जिससे, शहरी पलायन से वहाँ जनसांख्यिकीय असंतुलन देखने को मिलता है और स्थानीय लोगों में रोजगार क्षेत्र में क्षेत्रवाद की मानसिकता का जन्म होता है और स्थानीय लोगों में रोजगार की असुरक्षा का भाव पैदा होता है। परिणामस्वरूप, मुम्बई में किसी दूसरे राज्यो के लोगो के साथ दुर्व्यवहार जैसी घटनाएँ भी देखने को मिलती हैं। द्वितीय, ग्रामीण क्षेत्रो से उत्पादकों यानी किसानों की कमी हो जाती है, क्योंकि जब एक पीढ़ी कृषि क्षेत्र से सेवा अथवा विनिर्माण क्षेत्र में जायेगी, तो कृषि क्षेत्र में न्यूनता होने की पूर्ण सम्भावना है।
एक अन्य रोचक तथ्य यह भी है कि गाँव से जब व्यक्ति शहर जाने के विषय में सोचता है, तो वह पुनः नैतिकता के द्वंद्व में फँस जाता है। एक तरफ उसका गाँव, जहाँ वह पीढ़ी दर पीढ़ी रहता है। उसका सम्मान, परिवार, आवास, रिश्तेदार, भूमि आदि सबकुछ गाँव में होता है; जिसे त्यागकर उसे शहर की ओर जाना होता है। वहीं उसे शहर के एकाकी जीवन का भी आभास होता है, जहाँ किसी को किसी से मतलब नहीं होता है। शहर के जीवन में प्रवेश किये जहाँ लोगों के जुबान से एकाकीपन की कहानियाँ भी लोक विचरण कर रही होती हैं। जिन्हें (अज्ञात कवि की) दो पंक्तियों के माध्यम से समझ सकते हैं :

